करघे से कनेक्टिविटी तक : हिम एमएसएमई फेस्ट से ऐसे बदलेगी हिमाचल प्रदेश के बुनकरों की दशा और दिशा
हिमाइना न्यूज, ब्यूरो।
शिमला, 6 जनवरी। जब शिमला के ऐतिहासिक रिज मैदान पर हजारों हस्तनिर्मित शॉलें एक साथ सजीं, तो यह सिर्फ एक भव्य प्रदर्शनी नहीं थी, यह हिमाचल के बुनकरों के भविष्य का संकेत था। हिम एमएसएमई फेस्ट 2026 का सफल आयोजन एक सवाल भी छोड़ गया कि क्या यह उत्सव आने वाले वर्षों में बुनकरों की जिं दगी बदल पाएगा? इसका जवाब है हाँ। इस आयोजन के चलते कई स्तरों पर बुनकरों के जीवन में बदलाव होंगे।
अब तक बुनकर अक्सर व्यवस्था के हाशिये पर रहे। उनकी कला प्रदर्शनियों में तो दिखती थीं, लेकिन नीतियों और बाज़ार की मुख्यधारा से दूर रही। हिम एमएसएमई फेस्ट ने इस क्रम को उलट दिया। यहाँ बुनकर उत्पाद नहीं, कहानी बनकर सामने आए। कौन ऊन तैयार करता है, कौन डिज़ाइन बनाता है, और किस पहाड़ी गाँव में करघा आज भी सुबह सबसे पहले बोलता है, यह सब खरीदारों और निवेशकों ने प्रत्यक्ष देखा।
इस आयोजन का पहला और सीधा असर आमदनी पर पड़ेगा। बुनकरों को थोक खरीदारों, फैशन हाउसों और निर्यातकों से सीधा संवाद करने का मिला, बिचौलियों पर निर्भरता कम होने की संभावना बनी तथा ‘हैंडमेड’ और ‘स्लो फैशन’ की वैश्विक माँग से बेहतर मूल्य मिलने का रास्ता खुला अब शॉल केवल सर्दी से बचाव का साधन नहीं, बल्कि प्रीमियम प्रोडक्ट के रूप में देखी जाने लगी है।
हिम एमएसएमई फेस्ट ने बुनकरों को यह समझ दी कि कला तभी टिकेगी, जब वह ब्रांड बनेगी। अब आने वाले समय में कुल्लू, किन्नौर, मंडी और कांगड़ा आदि की जिला-वार पहचान और मज़बूत होगी।
जीआई टैग और प्रमाणिकता का महत्व बुनकर स्वयं समझने लगे हैं। यह बदलाव उन्हें कारीगर से उद्यमी की ओर ले जाएगा। हिमाचल के हथकरघा क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी हमेशा से रही है, लेकिन पहचान कम मिली।
इस फेस्ट के बाद महिला बुनकर स्वयं सहायता समूहों के ज़रिये संगठित होंगी, युवाओं को करघे से जुड़ने का आर्थिक कारण मिलेगा।
हिम एमएसएमई फेस्ट 2026 ने यह भी दिखाया कि तकनीक परंपरा की दुश्मन नहीं है। डिजिटल मार्केटिंग, ई-कॉमर्स प्लेटफ़ॉर्म, ऑनलाइन ऑर्डर और कस्टम डिज़ाइन, इन सबने बुनकरों को सिखाया कि करघा गाँव में रहे, बाज़ार दुनिया भर में हो सकता है।
इस आयोजन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि यह सिर्फ़ उत्सव बनकर नहीं रह गया।
उद्योग विभाग, एमएसएमई तंत्र और ज़िला उद्योग केंद्रों ने बुनकरों को यह भरोसा दिया कि प्रशिक्षण, डिज़ाइन अपग्रेड, वित्तीय सहायता और बाज़ार से जोड़ने की प्रक्रिया अब लगातार चलेगी, केवल आयोजन तक सीमित नहीं रहेगी।
हिम एमएसएमई फेस्ट में जब दर्शकों की नज़र रंग-बिरंगी शॉलों पर ठहरती है, तो उन्हें सिर्फ़ ऊन, डिज़ाइन और रंग दिखाई देते हैं, लेकिन इन शॉलों के पीछे हर ज़िले की मेहनत, योजना और प्रशासनिक समर्पण की एक पूरी कहानी बुनी होती है।
हिम एमएसएमई फेस्ट में हर ज़िले की शाल का प्रदर्शन इसी सामूहिक नेतृत्व का जीवंत उदाहरण बना, जहाँ ज़मीनी अनुभव और सांस्कृतिक समझ ने मिलकर हिमाचल की पहचान को मंच दिया। इस प्रयास में हर ज़िले के महाप्रबंधक की भूमिका निर्णायक रही। उन्होंने न केवल कारीगरों को जोड़ा, बल्कि अपनी ज़मीन की विरासत को गर्व के साथ प्रस्तुत किया।
हिम एमएसएमई फेस्ट में हर ज़िले की शाल केवल प्रदर्शनी नहीं थी, वह स्थानीय कारीगर, प्रशासन और संस्कृति के बीच साझेदारी का प्रतीक थी। उद्योग विभाग के महाप्रबंधकों की सोच ने यह साबित किया कि विकास तब टिकाऊ होता है, जब वह अपनी जड़ों से जुड़ा हो।
महाप्रबंधक, शिमला संजय कंवर कहते हैं कि शिमला की शाल केवल ठंड से बचाव नहीं, बल्कि पहाड़ की गरिमा है। हमारा प्रयास था कि यह गरिमा मंच पर भी वैसी ही दिखे। उनके नेतृत्व में शिमला की शॉलें सादगी और शालीनता का प्रतीक बनकर उभरीं।
कांगड़ा के महाप्रबंधक ओम प्रकाश जरयाल ने बताया कि कांगड़ा की शाल में चित्रकला की आत्मा बसती है। जब कारीगर को मंच मिलता है, तब कला खुद बोलती है। कांगड़ा की शॉलों में रंग और रेखाएँ दर्शकों को लोककला की गहराई तक ले गईं।
कुल्लू के महाप्रबंधक राजेश शर्मा कहते हैं कुल्लू शाल हमारी वैश्विक पहचान है। इसे हर मंच पर सही संदर्भ और सम्मान के साथ प्रस्तुत करना हमारी ज़िम्मेदारी है। कुल्लू की शालें उत्सव की धड़कन बनकर उभरीं।
बिलासपुर एवं मंडी (अतिरिक्त प्रभार) के , महाप्रबंधक जी. आर. अभिलाषी का दृष्टिकोण स्पष्ट है कि हथकरघा केवल उत्पाद नहीं, ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। दो ज़िलों की ज़िम्मेदारी निभाते हुए यही सोच केंद्र में रही। यह संयुक्त दायित्व समन्वय और अनुभव का उदाहरण बना।
सुरेन्द्र कुमार, महाप्रबंधक, सोलन कहते हैं कि आज की शाल को बाज़ार की समझ भी चाहिए। परंपरा तभी टिकती है, जब वह समय के साथ चलती है। सोलन की प्रस्तुति में यह संतुलन साफ़ दिखा।
सिरमौर के महाप्रबंधक विनीत शर्मा का कहना है कि सिरमौर की शालें दिखावे में नहीं, टिकाऊपन में विश्वास रखती हैं। उनकी सादगी ने दर्शकों को सहजता से जोड़ा।
किन्नौर के महाप्रबंधक जी. एल. नेगी कहते हैं कि किन्नौर की शाल ऊँचाइयों, जलवायु और जीवनशैली की कहानी कहती है। उन शॉलों में पहाड़ की कठोरता और सुंदरता दोनों झलकती है।
शिमला के प्रबंधक विकास गोवर्धन दास के अनुसार, जब सभी ज़िलों की मेहनत एक मंच पर आती है, तब असली हिमाचल दिखता है। उनकी भूमिका ने ज़िला-स्तरीय प्रयासों को एक साझा दृष्टि दी।
पीटरहॉफ की भव्य इमारत में जब हिम एमएसएमई फेस्ट के दिन अतिथियों की गूंज, तालियों की आवाज़ और कैमरों की चमक दिखाई दे रही थी, तब मंच के पीछे एक ऐसी टीम पूरी निष्ठा से काम कर रही थी, जिनके बिना यह आयोजन अधूरा होता। यह कहानी है उस बैक एंड टीम की, जिसने अतिथियों के सार्वजनिक अभिनंदन, स्मृति चिन्ह, शाल–टोपी और प्रोटोकॉल की हर बारीकी को सहज, गरिमामय और यादगार बनाया।
इस पूरी व्यवस्था की कमान थी वीरेंद्र शर्मा के नेतृत्व में जिन्होंने टीम को सिर्फ़ निर्देश नहीं दिए, बल्कि उसे एक परिवार की तरह जोड़े रखा। परिणाम यह हुआ कि हर अतिथि का स्वागत केवल औपचारिक नहीं, बल्कि हिमाचली आत्मीयता से भरा नजर आया।
दूसरे दिन का कार्यक्रम चुनौतीपूर्ण था—लगातार आने-जाने वाले गणमान्य अतिथि, समयबद्ध मंच संचालन और परंपरा के अनुरूप सम्मान। लेकिन टीम ने इसे अवसर में बदला। स्मृति चिन्ह, शाल और टोपी, ये सिर्फ़ वस्तुएँ नहीं थीं, बल्कि हिमाचल की संस्कृति का सम्मान थीं, जिन्हें अतिथियों तक सही समय और सही भाव के साथ पहुँचाना इस टीम की ज़िम्मेदारी थी।
इन सभी ने मिलकर यह साबित किया कि टीमवर्क कोई नारा नहीं, अभ्यास है और जब अभ्यास प्रतिबद्धता से हो, तो आयोजन खुद-ब-खुद सफल हो जाता है।
जहाँ दर्शकों को मंच पर कार्यक्रम दिखता है, वहीं इस टीम के लिए हर सेकंड एक रणनीति था, कौन अतिथि कब मंच पर आएंगे, किसे कौन-सा सम्मान दिया जाएगा, और कैसे हर चीज़ बिना हड़बड़ी के पूरी हो। यह सब ऐसे हुआ कि किसी को मेहनत दिखी ही नहींऔर यही सबसे बड़ी सफलता है।
इतिहास और विरासत से भरे पीटरहॉफ में यह टीम भी आयोजन का हिस्सा बन गई एक ऐसी टीम, जिसने साबित किया कि इवेंट की आत्मा मंच के पीछे बसती है।
हिम एमएसएमई 2026 के दूसरे दिन का सफल सार्वजनिक अभिनंदन इस बात का प्रमाण है कि नेतृत्व अगर समन्वयकारी हो और टीम प्रतिबद्ध तो हर आयोजन यादगार बनता है।
वीरेंद्र शर्मा के नेतृत्व में यह बैक एंड टीम न केवल एक ज़िम्मेदारी निभा रही थी, बल्कि हिमाचल की मेहमाननवाज़ी की परंपरा को जीवंत कर रही थी। तालियाँ भले मंच पर गूंजी हों, लेकिन उनकी गूंज इस टीम तक भी उतनी ही पहुँचती है|